जानिए कैसे लगे अग्निदेव को दस्त और उससे छुटकारा पाने के लिए उन्होंने क्या किया


अग्निदेव
अग्निदेव को भी इस तरह का विकार उत्पन्न हो गया था। फिर इसके उपचार के लिए उन्होंने क्या किया आइये  विस्तृत से जानते है।

सुनने में थोडा अजीब है ना ! हां पर ये सच है, अग्निदेव को भी इस तरह का विकार उत्पन्न हो गया था। फिर इसके उपचार के लिए उन्होंने क्या किया आइये  विस्तृत से जानते है।

यह व्यथा है अग्निदेव की

 

प्राचीनकाल में इंद्र के समान बल व पराक्रम से संपन्न श्वेतकि नाम के राजा थे।  उस समय उनके जैसा यज्ञ करने वाला दूसरा कोई नहीं था।  प्रतिदिन उनकी मन में यज्ञ और दान के अलावा दूसरा कोई विचार नहीं उठता था। इसलिए वह राजा ऋत्विजों (यज्ञ करने वाले ऋषि) के साथ यज्ञ किया करते थे।  यज्ञ करते-करते ऋत्विजों  की आँखें धुएँ से व्याकुल हो उठी तथा वे सभी खिन्न होकर राजा को छोड़कर चले गए। परन्तु यज्ञनारायण राजा के मन में किसी समय यह संकल्प उठा की मैं तो सौ वर्षों तक निरंतर चलने वाला एक यज्ञ आरंभ करूँ। लेकिन उसे उस यज्ञ के लिए ऋत्विज नहीं मिलें।

अपनी तपस्या में लीन राजा श्वेतकि

तब राजा ने कैलाश पर्वत पर जाकर शिव भगवान्  की कठोर तपस्या की, राजा की कठिन तपस्या देखकर भगवान शिव ने उसे दर्शन दिए व उससे उसकी इच्छा पूछी। तब राजा ने भगवान् शिव को सारा किस्सा वृतांत में सुनाया। फिर भगवन शिव ने राजा से कहा में कि मै एक शर्त पर तुम्हारा यज्ञ कराऊंगा।

भगवान् बोले – राजन ! यदि तुम ब्रह्माचर्य का पालन करते हुए बारह वर्षों तक घी की निरंतर धारा द्वारा अग्निदेव को तृप्त करो तो मुझसे जिस कामना की इच्छा कर रहे हो, उसे पाओगे। इस प्रकार शिव की इच्छा से राजा ने सारा कार्य संपन्न  किया। बारहवां वर्ष पूर्ण होने पर भगवन शिव वापस आये और बोले – राजन ! पृथ्वी पर मेरे ही अंशभूत ऋषि दुर्वासा नाम से विख्यात है वे तुम्हारा यज्ञ कराएँगे।

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ऋषि दुर्वासा द्वारा यज्ञ संपन्न

फिर यथासमय उस राजा का यज्ञ दुर्वासा ऋषि द्वारा आरम्भ हुआ।  उनके यज्ञ में अग्नि ने लगातार बारह वर्षों तक घृतपान  किया था जिससे अग्निदेव को अत्यधिक तृप्ति  हुई थी। 

 उनका रंग सफ़ेद हो गया, उनकी कान्ति फीकी पड़ गयी तथा वे पहले की भाँति प्रकाशित नहीं होते थे।  तब अग्निदेव के पेट में विकार हो गया, वे अपने तेज़ से हीन हो गये।

कांतिहीन अग्निदेव

स्वयं को तेजहीन देख वे ब्रह्मदेव के पास गये तथा उनसे पुनः स्वस्थ होने का उपाय पूछा तब ब्रह्मा जी ने कहा कि खांडव वन में इस समय सभी प्रकार के जीव जंतु  निवास करते है उन्ही के मेद से तृप्त होकर ही तुम स्वस्थ हो सकोगे।  तब अग्निदेव उस वन को जलने के लिए गये किन्तु वहाँ के हाथियों तथा अन्य जन्तुओं के जल छिड़काव से उन्हें बुझा दिया व अग्निदेव का प्रयास व्यर्थ हुआ।

अग्निदेव पुनः ब्रह्मा जी के पास गये तब ब्रह्मा जी बोले कि तुम्हें खांडव वन को जलने के लिए कुछ समय प्रतीक्षा करनी होगी। इसके बाद तुम उस वन को जला पाओगे, उस समय नर और नारायण दोनों   तुम्हारे सहायक होंगे।

नर नारायण बने सहायक

फिर जब दीर्घकाल के बाद नर-नारायण अर्जुन व श्रीकृष्ण के रूप में अवतीर्ण हुए तब निश्चित समय पर अग्निदेव ने उन दोनों से खांडव वन जलने की याचना की।  तब अर्जुन ने अग्निदेव  से कहा – कि भगवन मेरे पास बहुत सरे दिव्या अस्त्र है किन्तु मेरे पास मेरे बाहुबल के अनुरूप धनुष नहीं है  व इसके आलावा मुझे अत्यधिक बाणों की आवश्यकता के कारण अक्षय तुनीर व एक शक्तिशाली रथ भी नहीं है।  तब अग्निदेव ने वरुणदेव का चिंतन किया, वरुणदेव प्रकट हुए तब अग्निदेव ने उनसे उनका दिव्या धनुष गांडीव व कपिलयुक्त ध्वजा से सुशोभित रथ अर्जुन को देने की प्राथना की।  वरुणदेव ने उनकी याचना स्वीकारी और धनुष और रथ अर्जुन को सौंप दिए।  तब अर्जुन ने अग्निदेव का अभिवादन करते हुए कहा – भगवान अब आप इस वन को जलाना प्रारम्भ करे हम आपकी सहायता करेंगे। तब अग्निदेव ने  उस वन को चारो और से जलने लगे तथा उनकी सहायता के लिए श्रीकृष्ण और अर्जुन समस्त प्राणियों का संहार करने लगे। कई दिनों तक भयंकर संहार करने के बाद अग्निदेव को तृप्ति हुई जिससे उनकी पीड़ा एवं विकार भी समाप्त हो गए। तब वे पुन: अपने तीव्र तेज़ को प्राप्त करते हुए स्वस्थ हो गये।                     

 

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